1732 में जब वह 25 वर्ष के थे तो उनके पिता ने उनको सोघरिया रुस्तम पर विजय करने के लिए भेजा जिसको सूझबूझ से उन्होंने फतेह कर लिया। भरतपुर जहां था वह सोघरिया जाट रुस्तम के अधिकार में था सन 1733 में भरतपुर नगर की नींव डाली गई
मराठा, राजपूतों और मुगलों के साथ-साथ इन्होंने राजस्थान के भरतपुर, धौलपुर, अलवर जिले, हरियाणा के गुड़गांव, रोहतक, झज्जर, फरीदाबाद, रेवाड़ी, मेवात जिले, दिल्ली और उत्तर प्रदेश के आगरा, अलीगढ़, बुलंदशहर, गाजियाबाद, फिरोजाबाद, इटावा, हाथरस, एटा, मैनपुरी, मथुरा, मेरठ जिले तक इनका एक विशाल भूखंड पर साम्राज्य था।

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महाराजा सूरजमल ने 1761 में पानीपत की तीसरी लड़ाई में अहमद शाह अब्दाली के द्वारा हार के पश्चात शेष बची सेना के खाने-पीने, कपड़े उनके इलाज की सामग्री की व्यवस्था की। इस युद्ध में 50 हजार मराठा सेना वीरगति को प्राप्त हो गई। इस युद्ध में महारानी किशोरी ने जनता से अन्न इकट्ठा करने की अपील की और जाते हुए बचे सैनिकों को एक एक रुपया, वस्त्र और कुछ अनाज दिया। बहुत से परिवारों को सूरजमल ने यहां भी बसा लिया।
महाराष्ट्र में डांगे भी जाट वंश के बताते हैं और हरियाणा में दांगी जाट भी इनसे संबंधित हैं।
“वीरों की सेज युद्ध भूमि है” 25 दिसंबर 1763 ई. को मुगलों ने धोखे से घात लगाकर महान योद्धा की हिडन नदी के तट पर नवाब नजीबुद्दौला के साथ युद्ध में सूरजमल की हत्या कर दी गई। उसके एक साल बाद ही सूरजमल के पुत्र जवाहर सिंह ने बदला लेकर लाल किले को जीत लिया। महाराजा सूरजमल की स्मृति में 25 दिसंबर को हर वर्ष सूरजमल जयंती मनाई जाती है।
कहावत “राजा झुके, झुके मुगल अंग्रेज, झुका गगन सारा। सारे जहां के शिश झुके, झुका न कभी सूरज हमारा।
| Maharaja Surajmal Biography In Hindi | |
| महाराजा सूरजमल शासन अवधि | 1755 – 1763 ई. |
| पिता | बदन सिंह |
| माता | महारानी देवकी |
| पत्नी | महारानी किशोरी देवी |
| पुत्र | 5 (रणजीत सिंह, नवल सिंह, नाहर सिंह, जवाहर सिंह और रतन सिंह) |
| घराना | सिनसिनवार जाट |
उनकी वीरता का वर्णन कवि सुदन ने “सुजान चरित्र” में किया। उनको “जाटों का प्लेटो” की उपाधि से नवाजा गया।
महाराजा सूरजमल अपने पीछे 10 करोड़ का सैनिक खजाना छोड़ गया था। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि उस समय कितना संपन्न राज्य था।
सूरजमल से पहले गोकुल जाट नेता अंग्रेजों के मंदिर, मूर्ति भंजक नीति के सख्त खिलाफ थे क्योंकि औरंगजेब कट्टर सुन्नी मुसलमान था। उसने आगरा और मथुरा के जाटों पर अत्याचार किए। गोकुल राजाराम ने इस अत्याचार का विरोध किया और सिकंदरपुर में अकबर के मकबरे से कीमती सोने चांदी के पत्थरों को उखाड़ दिया। राजा राम के बाद चूड़ामन भी जीवन भर तक मुगलों के साथ संघर्ष करते रहे।
कविताएं
महाराजा सूरजमल पर तीन कविताएं भी लिखी गई है जिसमें प्रथम कविता के रचयिता रामलाल जाणी थे तथा दूसरी और तीसरी के लेखक बलबीर घिटाला तेजा भगत थे।
महाराजा सूरजमल इतने बुद्धिमान थे कि इतिहासकारों ने उनकी तुलना ओडिसस से की थी। सूरजमल ने संघर्ष के रास्ते को अपनाने से पहले शांतिप्रिय उपायों का यत्न किया था।
]]>उन्होंने जानी खुर्द गांव से अपनी स्कूल की पढ़ाई की। 1919 में दसवीं की पढ़ाई गवर्नमेंट हाई स्कूल से की।
1923 में स्नातक की पढ़ाई आगरा आगरा से तथा 1925 में मास्टर ऑफ आर्ट हिस्ट्री से पूरी की उनकी कानून में भी रुचि थी। इसके बाद वह कांग्रेस में शामिल होकर एक राजनीतिक बन गए और नमक सत्याग्रह से भारत छोड़ो आंदोलन तक गांधी के साथ संघर्ष करते रहे।

| Chaudhary Charan Singh Biography In Hindi | |
| नाम | चौधरी चरण सिंह |
| पत्नी का नाम | गायत्री देवी |
| जन्म | 23 दिसंबर 1902 |
| मृत्यु | 29 मई 1987 |
| प्रसिद्धि | किसान नेता के रूप में |
| पार्टी | कांग्रेस और लोकदल |
| भाषा | हिंदी अंग्रेजी और उर्दू |
| जाति | जाट |
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वह पढ़ने लिखने के बहुत शौकीन थे। उन्होंने भारत की गरीबी और उसका समाधान, किसानों की संपत्ति, जमीदारी उन्मूलन, शिष्टाचार आदि किताबे लिखी।
लोगों की सेवा करते करते 84 वर्ष के जीवन काल में 29 मई 1987 को किसान नेता अपना जीवन रूपी सफर समाप्त कर गए। उनको आज भी प्रधानमंत्री के बजाय किसान नेता के रूप में याद किया जाता है।
]]>छोटूराम की प्रारंभिक शिक्षा उनके गांव से थोड़ी दूर झज्जर के मिडिल स्कूल में हुई। फिर बाद में वह क्रिश्चियन मिशन स्कूल दिल्ली में दाखिल हो गए, लेकिन वहां पर फीस का खर्च ज्यादा था। उनको वहन करने में दिक्कत का सामना करना पड़ रहा था। 1930 में इंटर पास करने के बाद उन्होंने दिल्ली के सेंट स्टीफन कॉलेज से ग्रेजुएशन किया। फिर धीरे-धीरे उन्होंने आर्य समाज में भी अपनी पहचान बनाई। 1905 में सर छोटूराम ने राजा रामपाल के वहां एक सचिव के रूप में कार्य किया और 1907 तक अंग्रेजी अखबार का संपादन किया। इसके बाद वह वकालत की डिग्री करने आगरा चले गए।
एक दिन चौधरी छोटूराम अपने पिता के साथ कर्ज लेने साहूकार के पास सापला गए। वहां पर उस साहूकार ने उसके पिता सुखीराम का बहुत अपमान किया। उसी दिन से छोटूराम ने ठान लिया कि वह अन्याय के खिलाफ लड़ेंगे। उनकी पहली हड़ताल क्रिश्चियन मिशन स्कूल के प्रभारी के खिलाफ हुई। इस हड़ताल के बाद वह जनरल राबर्ट के नाम से प्रसिद्ध हुए। इसके बाद उन्होंने गरीबों, किसानों और कमेरो के लिए आवाज उठाई और उनको अंग्रेजी हुकूमत से अधिकार दिलाए। 1920 में छोटूराम ने कांग्रेस छोड़ दी क्योंकि वह महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन के पक्षधर नहीं थे, वह सोचते थे कि सरकार के साथ मिलकर गरीब किसानों का भला किया जा सकता है। सरकार के खिलाफ लड़कर नहीं, फिर उन्होंने यूनियनिस्ट पार्टी की स्थापना की और 1937 के प्रोवोशियन असेंबली चुनाव में उनकी पार्टी विजय हुई और वह विकास व राजस्व मंत्री बने।
| छोटूराम का जन्म | 24 नवंबर 1881 |
| बचपन का नाम | रिछपाल |
| पिता का नाम | सुखीराम |
| उपाधि | किसानों के मसीहा, रहबर ए आजम, सर, दीनबंधु |
| मृत्यु | 09 जनवरी 1945 |
1. 1913 में रोहतक में जाट स्कूल की स्थापना की।
2. वकालत जैसे व्यवसाय में भी उन्होंने नए – नए कीर्तिमान जोड़े जैसे झूठे मुकदमे न लेना, छल कपट से दूर रहना, गरीबों को निशुल्क कानूनी सलाह देना।
3. छोटूराम ने 1915 में क्रांतिकारी समाचार पत्र जाट गजट की शुरुआत की।
4. चौधरी छोटूराम ने 1930 में दो महत्वपूर्ण कानून पास कराने का श्रेय प्राप्त है। इन कानूनों से किसानों को साहूकारों से छुटकारा दिलाने का कार्य किया।
पंजाब रिलीफ इंडिपेंडेंस 1934 और द पंजाब डेब्ट्रस प्रोटेक्शन एक्ट 1936 यह कानून किसानों की कमर तोड़ने वाले ब्याज, उनके कर्ज का निपटारा और किसानों के अधिकारों से जुड़े आयाम थे। इन कानूनों से किसानों को साहूकारों के शोषण से मुक्ति मिली।
5. भाखड़ा बांध: सर छोटूराम ने ही भाखड़ा बांध का प्रस्ताव रखा था।
छोटूराम ने किसानों को क्या दो बातें बताई थी: मेरे भोले किसान एक तो बोलना सीख ले और दूसरा दुश्मन को पहचान ले।
अक्टूबर 2018 में पीएम नरेंद्र मोदी ने सापला, जिला रोहतक में सर छोटूराम की 64 फुट ऊंची प्रतिमा का अनावरण किया था। इस मौके पर मोदी ने कहा था छोटूराम का कद इतना बड़ा था कि सरदार पटेल ने उनके बारे में कहा था कि अगर छोटूराम जीवित होते तो हमें पंजाब की चिंता नहीं करनी पड़ती।
]]>इस आयोजन की विशेषता रही कि इस अवसर पर नशा मुक्ति व मृत्यु भोज जैसी सामाजिक कुरीतियां को छोड़ने का आहवान डा सुखबीर राठी सेवा निवृत Dean HAU Hisar बड़े भाई द्वारा स्वर्गीय श्री बलजीत सिंह राठी को श्रद्धाजली स्वरूप किया गया। इस अवसर पर श्री अनिल राठी पुत्र स्वर्गीय श्री बलजीत राठी,युवा प्रधान जाट सेवा संघ रोहतक ने मृत्यु भोज न करके उस एवज में छोटूराम धाम, जसिया को रु 1100 ओर 11 कट्टे गेहूं के दान स्वरूप देने की घोषणा की। श्री अनिल राठी के ताऊजी डा सुखबीर राठी जी के दो बच्चे डा ज्योति हेड ऑफ Dept M D University Rohtak ने रू 21000/ तथा श्री सुमित राठी निवासी ऑस्ट्रेलिया ने भी रू 31000/ डा धर्मवीर राठी, ताऊजी अनिल राठी ने रू 51000/ व श्री अनिल राठी पुत्र सूरजमल राठी पुत्र श्री धारा सिंह (दूसरे दादा जी) ने भी रू 5100/ का दान इस संस्था को दिया। इस अवसर पर छोटूराम धाम की टीम विंग कमांडर महेंद्र सिंह मलिक, चंद्र सिंह सिवाच, कमांडेंट सतबीर सतबीर ढोचक, सुरेंदर ढिल्लों, दलबीर मालिक उपस्थित रहे।
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