Jat Sewa Sangh https://jatsewasangh.com Mon, 17 Jul 2023 12:01:13 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.7.5 https://jatsewasangh.com/wp-content/uploads/2023/04/cropped-cropped-jSS-logo-32x32.png Jat Sewa Sangh https://jatsewasangh.com 32 32 महाराजा सूरजमल की जीवनी: कौन थे महाराजा सूरजमल   https://jatsewasangh.com/2023/07/17/maharaja-surajmal-biography-in-hindi/ Mon, 17 Jul 2023 09:34:41 +0000 https://jatsewasangh.com/?p=17767 Maharaja Surajmal Biography in Hindi: 13 फरवरी 1707 को भरतपुर के राजा चूड़ामन सिंह के बाद उनके भतीजे बदन सिंह जोकी भरतपुर रियासत के राजा थे। उनको प्रतापी संतान प्राप्त हुई जो कि आगे चलकर एक महान, धीर-वीर और बलवान राजा बना जिसका नाम सूरजमल या सुजान था। वह क्षत्रिय जाट था। 1755 में राजा बदन सिंह ने सूरजमल को राज्य की कमान सौंप दी थी क्योंकि उनकी आंखो की ज्योति कम होने लगी थी। सूरजमल के पिता बदन सिंह ने पुरानी गढ़ी पर लोहागढ़ दुर्ग बनाया। उसने डिंग महलों का निर्माण करवाया और भरतपुर को राज्य की राजधानी बनाया। 

महाराजा सूरजमल के जीवन का प्रथम सफल अभियान

1732 में जब वह 25 वर्ष के थे तो उनके पिता ने उनको सोघरिया रुस्तम पर विजय करने के लिए भेजा जिसको सूझबूझ से उन्होंने फतेह कर लिया। भरतपुर जहां था वह सोघरिया जाट रुस्तम के अधिकार में था सन 1733 में भरतपुर नगर की नींव डाली गई

महाराजा सूरजमल का साम्राज्य विस्तार

मराठा, राजपूतों और मुगलों के साथ-साथ इन्होंने राजस्थान के भरतपुर, धौलपुर, अलवर जिले, हरियाणा के गुड़गांव, रोहतक, झज्जर, फरीदाबाद, रेवाड़ी, मेवात जिले, दिल्ली और उत्तर प्रदेश के आगरा, अलीगढ़, बुलंदशहर, गाजियाबाद, फिरोजाबाद, इटावा, हाथरस, एटा, मैनपुरी, मथुरा, मेरठ जिले तक इनका एक विशाल भूखंड पर साम्राज्य था।

Maharaja surajmal biography

महाराजा सूरजमल की सैन्य शक्तियां

  • महाराजा सूरजमल एक महान राजा और शक्तिशाली योद्धा था जो कि अपनी सैन्य शक्ति को संतुलित रखता था। उसकी सेना में 15000 घुड़सवार व 25000 पैदल सैनिक थे। सेना बहुत ही तेजस्वी और खूंखार थी। 
  • महाराजा सूरजमल ने भारत को मजहबी राष्ट्र बनाने के प्रयास को भी असफल कर दिया था जो कि नजीबुद्दौला द्वारा अहमद शाह अब्दाली के सहयोग से किया गया था।
  • 1757 में प्लासी युद्ध के वर्ष अहमदशाह अब्दाली दिल्ली की छाती पर पहुंच गया और ब्रिज के तीर्थ का विध्वंस करने के लिए आक्रमण किया। इसकी सेना के आगे सूरजमल की सेना अड़ गई जिससे सूरजमल की सेना के प्राण गए और अब्दाली को वापस जाना पड़ा।
  • मराठा शासक सदाशिव राव भाऊ अब्दाली को हराने के उद्देश्य से आगे बढ़ रहा था तो तभी पेशवा बालाजी बाजीराव ने भाऊ को सलाह दी कि उत्तर भारत में एक सूरजमल नामक वीर राजा रहता है। उसका सम्मान करना और युद्ध में उनकी सलाह लेना। लेकिन भाऊ ने सूरजमल से युद्ध संबंधी कोई भी परामर्श नहीं लिया, जिससे उसने अब्दाली के हाथों मुंह की खानी पड़ी और भारी नुकसान उठाना पड़ा। उस युद्ध के बाद लगभग 50 हजार मराठा परिवार सूरजमल के राज्य में ही बस गए। अब्दाली ने मराठों को शरण देने के कारण सूरजमल को चेतावनी भी दी कि वह हमारे शत्रुओं को हमे सौंप दें, लेकिन सूरजमल ने शरण में आए शरणार्थियों का साथ दिया और उनकी रक्षा की जिसके कारण विद्वानों ने उनके इस कार्य के लिए उनको बहुत सरहाया।
  • मराठों के साथ महाराजा सूरजमल के मतभेद थे क्योंकि पानीपत की तीसरी लड़ाई से पहले 1760 ई. में सदाशिव राव भाऊ और सूरजमल की एक मस्जिद को लेकर विवाद हो गया था। बात यह थी कि मथुरा में नबी मस्जिद थी जिसको देखकर भाऊ सूरजमल पर आग बबूला हो जाते हैं और कहते हैं आपका यहां इतने दिन से शासन है, लेकिन आपने यह मस्जिद क्यों नहीं तुड़वाई फिर सूरजमल ने कहा मैं सारी उम्र इस इलाके का बादशाह नहीं रहूंगा। कल को मुसलमान आकर हमारे मंदिरों को तोड़ देंगे और वहां पर मस्जिदों का निर्माण करा देंगे। बाद में भाऊ ने लाल किले के दीवाने खास की छत को सोने के लिए गिरवा दिया क्योंकि वह सोना बेचकर सैनिकों की तनख्वा देना चाहता था। सूरजमल ने उनको बहुत मना किया कि आप इसको मत गिराओ आप मेरे से 5 लाख ले लो लेकिन वह नहीं माने। फिर उसमे से भी तीन लाख का ही सोना निकला भाऊ और सूरजमल की कई बातों को लेकर तकरार हुई भाऊ ने यह भी कह दिया था कि मैं दक्षिणी से तुम्हारी ताकत के दम पर नहीं आया हूं।
  • मुगल शासन के बीच में ही सूरजमल ने भरतपुर में जाट राज्य को शिखर पर चढ़ाया और भरतपुर को शक्तिशाली राज्य बनाया, जिससे और राजा भी उनसे मदद मांगने लगे। महाराजा सूरजमल वह अजेय योद्धा थे, जिनका परचम विश्व भर में लहराया।
  • सूरजमल के मित्र जयपुर के महाराजा जयसिंह की मृत्यु के बाद उत्तराधिकारी युद्ध में महाराजा सूरजमल के सहयोग से उनके बड़े बेटे ईश्वरी सिंह विजयी हुए और जयपुर के सिंहासन पर बैठे।
  • दिल्ली पर कब्जा  1753 ई. में सूरजमल ने फिरोजशाह कोटला पर कब्जा किया और मराठों ने जनवरी 1754 से मई 1754 तक भरतपुर के कुम्हेर के किले को घेर कर रखा लेकिन वह इस किले को फतह नहीं कर पाए जिसके फलस्वरूप उन्होंने संधि करनी पड़ी।
  • महाराजा सूरजमल ने अफ़गानों को भी हराया था। जिससे सलावत खान, मीर बख्शी और अंसद खान आदि थे।

यह भी पढ़े: चौधरी चरण सिंह की जीवनी 

महाराजा सूरजमल की उदारता 

महाराजा सूरजमल ने 1761 में पानीपत की तीसरी लड़ाई में अहमद शाह अब्दाली के द्वारा हार के पश्चात शेष बची सेना के खाने-पीने, कपड़े उनके इलाज की सामग्री की व्यवस्था की। इस युद्ध में 50 हजार मराठा सेना वीरगति को प्राप्त हो गई। इस युद्ध में महारानी किशोरी ने जनता से अन्न इकट्ठा करने की अपील की और जाते हुए बचे सैनिकों को एक एक रुपया, वस्त्र और कुछ अनाज दिया। बहुत से परिवारों को सूरजमल ने यहां भी बसा लिया। 

महाराष्ट्र में डांगे भी जाट वंश के बताते हैं और हरियाणा में दांगी जाट भी इनसे संबंधित हैं।

  • सूरजमल ने अपने मजबूत क्षेत्रों में किले एवं महल बनवाए, जिसमें लोहागढ़ किला शामिल है। मराठों के पतन के बाद महाराजा सूरजमल ने हाथरस, बनारस, मैनपुरी, फरुखनगर, आगरा, धौलपुर, गाजियाबाद, झज्जर, रोहतक आदि इलाकों को फतह कर लिया था। कहा जाता है “जाट वीर सूरजमल ने हर युद्ध जीता था उसके बिना खुद इतिहास का खजाना रिता था” सूरजमल ने जाटों की ताकत का लोहा मनवाया था।

मृत्यु

“वीरों की सेज युद्ध भूमि है” 25 दिसंबर 1763 ई. को मुगलों ने धोखे से घात लगाकर महान योद्धा की हिडन नदी के तट पर नवाब नजीबुद्दौला के साथ युद्ध में सूरजमल की हत्या कर दी गई। उसके एक साल बाद ही सूरजमल के पुत्र जवाहर सिंह ने बदला लेकर लाल किले को जीत लिया। महाराजा सूरजमल की स्मृति में 25 दिसंबर को हर वर्ष सूरजमल जयंती मनाई जाती है।

कहावत “राजा झुके, झुके मुगल अंग्रेज, झुका गगन सारा। सारे जहां के शिश झुके, झुका न कभी सूरज हमारा

Maharaja Surajmal Biography In Hindi
महाराजा सूरजमल शासन अवधि1755 – 1763 ई.
पिताबदन सिंह
मातामहारानी देवकी
पत्नीमहारानी किशोरी देवी
पुत्र5 (रणजीत सिंह, नवल सिंह, नाहर सिंह, जवाहर सिंह और रतन सिंह)
घरानासिनसिनवार जाट

उपाधि

उनकी वीरता का वर्णन कवि सुदन ने “सुजान चरित्र” में किया। उनको “जाटों का प्लेटो” की उपाधि से नवाजा गया।

महाराजा सूरजमल अपने पीछे 10 करोड़ का सैनिक खजाना छोड़ गया था। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि उस समय कितना संपन्न राज्य था।

सूरजमल से पहले गोकुल जाट नेता अंग्रेजों के मंदिर, मूर्ति भंजक नीति के सख्त खिलाफ थे क्योंकि औरंगजेब कट्टर सुन्नी मुसलमान था। उसने आगरा और मथुरा के जाटों पर अत्याचार किए। गोकुल राजाराम ने इस अत्याचार का विरोध किया और सिकंदरपुर में अकबर के मकबरे से कीमती सोने चांदी के पत्थरों को उखाड़ दिया। राजा राम के बाद चूड़ामन भी जीवन भर तक मुगलों के साथ संघर्ष करते रहे।

कविताएं

महाराजा सूरजमल पर तीन कविताएं भी लिखी गई है जिसमें प्रथम कविता के रचयिता रामलाल जाणी थे तथा दूसरी और तीसरी के लेखक बलबीर घिटाला तेजा भगत थे। 

महाराजा सूरजमल इतने बुद्धिमान थे कि इतिहासकारों ने उनकी तुलना ओडिसस से की थी। सूरजमल ने संघर्ष के रास्ते को अपनाने से पहले शांतिप्रिय उपायों का यत्न किया था।

]]>
चौधरी चरण सिंह की जीवनी – Chaudhary Charan Singh Biography In Hindi https://jatsewasangh.com/2023/07/17/chaudhary-charan-singh-biography-in-hindi/ Mon, 17 Jul 2023 07:47:53 +0000 https://jatsewasangh.com/?p=17760 Chaudhary Charan Singh Biography In Hindi: चौधरी चरण सिंह का जन्म 23 दिसंबर 1902 को उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले के नूरपुर गांव में हुआ था। उनके जन्मदिवस पर ‘किसान दिवस’ मनाया जाता है। उनके पिता का नाम मीर सिंह एवं माता का नाम नेत्र कौर था। वह उच्च स्तरीय राजनीतिज्ञ व किसान हितेषी नेता थे अपितु उन्होंने कभी खेती नहीं की, लेकिन सारी उम्र किसानों के हको की आवाज उठाई। चौधरी चरण सिंह भारत के पांचवें प्रधानमंत्री थे। उनका कार्यकाल 28 जुलाई 1979 से 14 जनवरी 1980 तक रहा।

चौधरी चरण सिंह की शिक्षा

उन्होंने जानी खुर्द गांव से अपनी स्कूल की पढ़ाई की। 1919 में दसवीं की पढ़ाई गवर्नमेंट हाई स्कूल से की।

1923 में स्नातक की पढ़ाई आगरा आगरा से तथा 1925 में मास्टर ऑफ आर्ट हिस्ट्री से पूरी की उनकी कानून में भी रुचि थी। इसके बाद वह कांग्रेस में शामिल होकर एक राजनीतिक बन गए और नमक सत्याग्रह से भारत छोड़ो आंदोलन तक गांधी के साथ संघर्ष करते रहे।

chaudhary charan singh biography
Source: khaber hindi
Chaudhary Charan Singh Biography In Hindi
नामचौधरी चरण सिंह
पत्नी का नामगायत्री देवी
जन्म23 दिसंबर 1902
मृत्यु29 मई 1987
प्रसिद्धिकिसान नेता के रूप में
पार्टीकांग्रेस और लोकदल
भाषाहिंदी अंग्रेजी और उर्दू
जातिजाट

चौधरी चरण सिंह का राजनीतिक जीवन

  • सर्वप्रथम अपने राजनीतिक सफर की उड़ान उन्होंने सन 1937 में उत्तर प्रदेश के छपरौली विधानसभा चुनाव से भरी। इसके बाद वह सन 1946, 1952 और 1965 में भी विजय और अपने क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते रहे। फिर वह 1967 में भी जीत कर अपने राजनीतिक सफर और अपने कद को बढ़ाया।
  • 1946 में वह गोविंद पंत की सरकार में संसदीय सचिव के पद पर रहे। उन्होंने न्याय सूचना, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभागों में भी सेवाएं दी।
  • 1951 में राज्य में कैबिनेट मंत्री भी बनाया गया। 
  • 1952 में वह कृषि मंत्री बने और किसानों को उपयुक्त भाव दिए। इसके साथ-साथ व राजस्व मंत्री भी थे। 
  • 1959 में जब राजस्व एवं परिवहन विभाग के प्रभारी थे तब उन्होंने इस्तीफा दे दिया। चौधरी चरण सिंह की छवि एक दमदार एवं कड़क नेता के रूप में थी।
  • 1960 में सीबी गुप्ता के मंत्रालय में गृह एवं कृषि मंत्री भी रहे थे। उस समय यह भूमि होल्डिंग एक्ट लेकर आए
  • 1962-63 में श्रीमती सुचेता कृपलानी के मंत्रालय में कृषि एवं वन मंत्री के रूप के कार्य किया।
  • 1965 में कृषि विभाग को छोड़ दिया था 
  • 1966 को स्थानीय स्वशासन का प्रभार ले
  • जब कांग्रेस बंटवारे के दौर से गुजर रही थी तो 1970 में कांग्रेस पार्टी के ही सहयोग से सूबे के दूसरी बार मुख्यमंत्री बने। हालांकि तभी अक्टूबर में राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया था।
  • चौधरी चरण सिंह मजबूत नेता थे। यह प्रशासन में अक्षमता, भाई भतीजावाद और भ्रष्टाचार के सख्त खिलाफ थे। यह बहुत ही लोकप्रिय व किसानों के चहेते नेता रहे हैं।
  • 1974 में वह राष्ट्रीय राजनीति की तरफ अग्रसर हुए और विभिन्न दलों के साथ 29 अगस्त 1974 को लोकदल पार्टी का गठन किया। देश में तब इंदिरा गांधी की सरकार थी उस समय देश में आपातकाल लग गया और अन्य नेताओं की तरह चरण सिंह भी जेल गए।
  • आपातकाल के बाद देश में जनता दल की सरकार बनी जिसमें चौधरी चरण सिंह का महत्वपूर्ण योगदान था। उस सरकार के प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई तथा उप प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह बने उनके पास गृह एवं वित्त मंत्रालय भी था। फिर आपसी मतभेदों के कारण 1 जुलाई 1978 को मंत्रिमंडल से उनकी छुट्टी हो गई ।
  • सरकार से छुट्टी होने पर चौधरी साहब ने अपनी राजनीति रुतबा मजबूत किया और अपने जन्म दिवस 23 दिसंबर, 1978 को दिल्ली के बोट क्लब में शानदार रैली की जिसमें लाखों की संख्या में किसान पहुंच गए। 
  • यह इतनी धमाकेदार रैली थी कि 1 माह के अंदर उनकी सरकार में वापसी हुई और प्रधानमंत्री के साथ-साथ वित्त मंत्रालय भी दिया गया। 28 जुलाई 1979 को पीएम पद की शपथ ली, लेकिन बहुमत सिद्ध न होने के कारण वह लंबा नहीं टिक पाए, लेकिन प्रधानमंत्री की सूची में उनका नाम पांचवें प्रधानमंत्री के रूप में आ गया।

यह भी पढ़े : चौधरी सर छोटूराम की जीवनी: कौन थे किसानों के मसीहा

चौधरी चरण सिंह द्वारा लिखी गई पुस्तकें

वह पढ़ने लिखने के बहुत शौकीन थे। उन्होंने भारत की गरीबी और उसका समाधान, किसानों की संपत्ति, जमीदारी उन्मूलन, शिष्टाचार आदि किताबे लिखी।

चौधरी चरण सिंह की मृत्यु

लोगों की सेवा करते करते 84 वर्ष के जीवन काल में 29 मई 1987 को किसान नेता अपना जीवन रूपी सफर समाप्त कर गए। उनको आज भी प्रधानमंत्री के बजाय किसान नेता के रूप में याद किया जाता है।

]]>
चौधरी सर छोटूराम की जीवनी: कौन थे किसानों के मसीहा  https://jatsewasangh.com/2023/07/10/sir-chhotu-ram-biography/ Mon, 10 Jul 2023 06:58:12 +0000 https://jatsewasangh.com/?p=17747 Sir Chhotu Ram Biography In Hindi: हरियाणा प्रदेश के झज्जर जिले के गांव गढ़ी सापला में छोटूराम का जन्म 24 नवंबर 1881 हुआ था, उनके बचपन का नाम रिछपाल था, लेकिन घर में सबसे छोटा होने के कारण उनको छोटू कहने लगे। बाद में उनका नाम छोटूराम पड़ा। अंग्रेजों के शासनकाल में उनको किसानों के अधिकारों की आवाज उठाने के रूप में जाना जाता है। उनके पिता का नाम सुखीराम और दादा का नाम रामरतन था। उनके पास 10 एकड़ बरानी व बंजर जमीन थी।

चौधरी सर छोटूराम की शिक्षा

छोटूराम की प्रारंभिक शिक्षा उनके गांव से थोड़ी दूर झज्जर के मिडिल स्कूल में हुई। फिर बाद में वह क्रिश्चियन मिशन स्कूल दिल्ली में दाखिल हो गए, लेकिन वहां पर फीस का खर्च ज्यादा था। उनको वहन करने में दिक्कत का सामना करना पड़ रहा था। 1930 में इंटर पास करने के बाद उन्होंने दिल्ली के सेंट स्टीफन कॉलेज से ग्रेजुएशन किया। फिर धीरे-धीरे उन्होंने आर्य समाज में भी अपनी पहचान बनाई। 1905 में सर छोटूराम ने राजा रामपाल के वहां एक सचिव के रूप में कार्य किया और 1907 तक अंग्रेजी अखबार का संपादन किया। इसके बाद वह वकालत की डिग्री करने आगरा चले गए।

क्रांतिकारी भावना

एक दिन चौधरी छोटूराम अपने पिता के साथ कर्ज लेने साहूकार के पास सापला गए। वहां पर उस साहूकार ने उसके पिता सुखीराम का बहुत अपमान किया। उसी दिन से छोटूराम ने ठान लिया कि वह अन्याय के खिलाफ लड़ेंगे। उनकी पहली हड़ताल क्रिश्चियन मिशन स्कूल के प्रभारी के खिलाफ हुई। इस हड़ताल के बाद वह जनरल राबर्ट के नाम से प्रसिद्ध हुए। इसके बाद उन्होंने गरीबों, किसानों और कमेरो के लिए आवाज उठाई और उनको अंग्रेजी हुकूमत से अधिकार दिलाए। 1920 में छोटूराम ने कांग्रेस छोड़ दी क्योंकि वह महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन के पक्षधर नहीं थे, वह सोचते थे कि सरकार के साथ मिलकर गरीब किसानों का भला किया जा सकता है। सरकार के खिलाफ लड़कर नहीं, फिर उन्होंने यूनियनिस्ट पार्टी की स्थापना की और 1937 के प्रोवोशियन असेंबली चुनाव में उनकी पार्टी विजय हुई और वह विकास व राजस्व मंत्री बने।

चौधरी सर छोटूराम की जीवनी – Sir Chhotu Ram Biography In Hindi

छोटूराम का जन्म24 नवंबर 1881
बचपन का नामरिछपाल
पिता का नामसुखीराम
उपाधिकिसानों के मसीहा, रहबर ए आजम, सर, दीनबंधु
मृत्यु09 जनवरी 1945

सामाजिक कार्य व महत्वपूर्ण योगदान

 1. 1913 में रोहतक में जाट स्कूल की स्थापना की।

2. वकालत जैसे व्यवसाय में भी उन्होंने नए – नए कीर्तिमान जोड़े जैसे झूठे मुकदमे न लेना, छल कपट से दूर रहना, गरीबों को निशुल्क कानूनी सलाह देना।

3. छोटूराम ने 1915 में क्रांतिकारी समाचार पत्र जाट गजट की शुरुआत की।

 4. चौधरी छोटूराम ने 1930 में दो महत्वपूर्ण कानून पास कराने का श्रेय प्राप्त है। इन कानूनों से किसानों को साहूकारों से छुटकारा दिलाने का कार्य किया। 

पंजाब रिलीफ इंडिपेंडेंस 1934 और द पंजाब डेब्ट्रस प्रोटेक्शन एक्ट 1936 यह कानून किसानों की कमर तोड़ने वाले ब्याज, उनके कर्ज का निपटारा और किसानों के अधिकारों से जुड़े आयाम थे। इन कानूनों से किसानों को साहूकारों के शोषण से मुक्ति मिली।

5. भाखड़ा बांध: सर छोटूराम ने ही भाखड़ा बांध का प्रस्ताव रखा था।

छोटूराम ने किसानों को क्या दो बातें बताई थी: मेरे भोले किसान एक तो बोलना सीख ले और दूसरा दुश्मन को पहचान ले।

सम्मान – Sir Chhotu Ram Biography

अक्टूबर 2018 में पीएम नरेंद्र मोदी ने सापला, जिला रोहतक में सर छोटूराम की 64 फुट ऊंची प्रतिमा का अनावरण किया था। इस मौके पर मोदी ने कहा था छोटूराम का कद इतना बड़ा था कि सरदार पटेल ने उनके बारे में कहा था कि अगर छोटूराम जीवित होते तो हमें पंजाब की चिंता नहीं करनी पड़ती।

]]>
श्री बलजीत राठी की तेरहवीं की रस्म हुई: मृत्यु भोज न करके उस एवज में छोटूराम धाम, जसिया को दान दिया https://jatsewasangh.com/2023/05/01/shree-baljit-rathi-teravi-chhotu-ram-dham-ko-daan-dia/ Mon, 01 May 2023 05:07:52 +0000 https://jatsewasangh.com/?p=17483 दिनांक 30 अप्रैल 2023 को सुबह 9.30 बजे श्री बलजीत राठी s/o श्री भले सिंह राठी गांव घडावठी की तेहरवीं की रस्म अदायगी पूर्ण आर्य सामाजिक रीति रिवाज से हवन करके संपन की गई। सेवा निवृत मास्टर जगत सिंह ढुल गांव भगवतीपुर ने हवन के साथ साथ लोगों को अपनी सांस्कृतिक विरासत ओर यज्ञ करने के फायदे समझाए। यज्यमान के रूप में अनिल राठी व उनकी पत्नी मीना हवन में उपस्थित रही। इस अवसर पर गांव के गणमान्य लोग,रिश्तेदार व छोटूराम धाम जसिया की टीम भी मौजूद रही।

इस आयोजन की विशेषता रही कि इस अवसर पर नशा मुक्ति व मृत्यु भोज जैसी सामाजिक कुरीतियां को छोड़ने का आहवान डा सुखबीर राठी सेवा निवृत Dean HAU Hisar बड़े भाई द्वारा स्वर्गीय श्री बलजीत सिंह राठी को श्रद्धाजली स्वरूप किया गया। इस अवसर पर श्री अनिल राठी पुत्र स्वर्गीय श्री बलजीत राठी,युवा प्रधान जाट सेवा संघ रोहतक ने मृत्यु भोज न करके उस एवज में छोटूराम धाम, जसिया को रु 1100 ओर 11 कट्टे गेहूं के दान स्वरूप देने की घोषणा की। श्री अनिल राठी के ताऊजी डा सुखबीर राठी जी के दो बच्चे डा ज्योति हेड ऑफ Dept M D University Rohtak ने रू 21000/ तथा श्री सुमित राठी निवासी ऑस्ट्रेलिया ने भी रू 31000/ डा धर्मवीर राठी, ताऊजी अनिल राठी ने रू 51000/ व श्री अनिल राठी पुत्र सूरजमल राठी पुत्र श्री धारा सिंह (दूसरे दादा जी) ने भी रू 5100/ का दान इस संस्था को दिया। इस अवसर पर छोटूराम धाम की टीम विंग कमांडर महेंद्र सिंह मलिक, चंद्र सिंह सिवाच, कमांडेंट सतबीर सतबीर ढोचक, सुरेंदर ढिल्लों, दलबीर मालिक उपस्थित रहे।

]]>